मगर पता नहीं वो मुझे क्यों बदर किए बैठे हैं…
April 7th, 2011 § 2 Comments
मेरी हर सोच में मेरी हर सास में
किसी की बातों में किसी से मुलाकातों में
किसी भी किताब के हर पन्नों में
हर किसी की आँखों में
तो अपनी हाथों की हर लकीरों में
पानी में फेके हुए पत्थर से उठी हर तरंगों में
सूर्य की आती हुई हर किरणों में
पंछिओं की चहचाहट में
रातों की खामोशिओं में
घड़ी की टिक टिक कर गुजरते हर पलों में
पानी की गिरती हर एक बूंदों में
अपने लिखे हर शब्दों में
हर गीतों में हर कहानियों में
चित्रकारों की नूमाईशों में
हवाओं में फिजाओं में लहरों में तूफानों में
अपनी हर कविता की कल्पनाओं में
मैं !! उन्हें तलाशने की कोसिस करता हूँ…
वो मेरी जिंदगी में कुछ इस कदर सामिल हैं!!
मगर पता नहीं वो मुझे क्यों बदर किए बैठे हैं…
अमरदीप गौरव