मगर पता नहीं वो मुझे क्यों बदर किए बैठे हैं…

मेरी हर सोच में मेरी हर सास में
किसी की बातों में किसी से मुलाकातों में
किसी भी किताब के हर पन्नों में
हर किसी की आँखों में
तो अपनी हाथों की हर लकीरों में
पानी में फेके हुए पत्थर से उठी हर तरंगों में
सूर्य की आती हुई हर किरणों में
पंछिओं की चहचाहट में
रातों की खामोशिओं में
घड़ी की टिक टिक कर गुजरते हर पलों में
पानी की गिरती हर एक बूंदों में
अपने लिखे हर शब्दों में
हर गीतों में हर कहानियों में
चित्रकारों की नूमाईशों में
हवाओं में फिजाओं में लहरों में तूफानों में
अपनी हर कविता की कल्पनाओं में
मैं !! उन्हें तलाशने की कोसिस करता हूँ…
वो मेरी जिंदगी में कुछ इस कदर सामिल हैं!!
मगर पता नहीं वो मुझे क्यों बदर किए बैठे हैं…

अमरदीप गौरव

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About amardeepgaurav
I m a 3d animator and Dynamics artist .......... m very friendly hard working cool......... m working with company "IRISIDEA TECHNOLOGIES PRIVET LIMITED",BANGALORE..

2 Responses to मगर पता नहीं वो मुझे क्यों बदर किए बैठे हैं…

  1. Roushan says:

    किताबो के पन्नों में रख
    लिया है आपने उन्हें
    कहीं वो भी न बिखर जाये
    शुखे फूलों जैसे और
    गिर पड़े उन पानो से
    हवा के एक झोखे के साथ

    रखना है तो उन्हें रखे अपनी
    जिंदगी के सबसे हसीं पलों में
    इस बहाने दो पल तो मिलेंगे
    मुस्कुराने के लिए

    जिंदगी में मिलती है
    ठोकरें गिराने के लिए
    पर जो हो गया खड़ा
    भूल अपने गुमो को
    वही है असली हक़दार
    सूरज की पहली किरण का
    रौशन

  2. Dhirendra kumar says:

    Milna ho to aise milon
    ke judaa hone ki zaroorat na ho
    Kehna ho to kuch aise kaho
    Ke zubaan ko bhi izazat na ho
    Pyaar karo zindagi bhar ke liye
    Do pal ki koi chahat na ho

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