ये कहानी है दो पलों की !

April 4th, 2012 § 9 Comments

जिंदगी दो पन्नों की
खुशी की एक दूसरी ग़मों की
क्या आखिरी क्या पहली
बस अपनी और अपनों की
ये कहानी है दो पलों की

मिलने की खुशी से जादा बिछड़ने का गम
तड़प भी ऐसी की दिन की रौशनी भी कम
नमी आखों में सूखे हैं होठ
कहीं पे हैं ढलाव तो कहीं पे हैं ओट

अपनों का प्यार अपनों के लिए तकरार
प्यारा सा संसार  और आपका इंतज़ार

जिंदगी दो पन्नों की
खुशी की एक दूसरी ग़मों की
क्या आखिरी क्या पहली
बस अपनी और अपनों की
ये कहानी है दो पलों की !

अमरदीप गौरव

बस अब तो सच्चाई की इंतिज़ार है !!!!

October 15th, 2011 § Leave a Comment

कह गए वो न जाने क्या

रह गए हम न जाने कहाँ

थम गए वक्त न जाने क्यों

हिल गयी धरती न जाने कैसे

पथ तो एक है पथिक अनेक हैं

पंथ तो एक है पंथी अनेक हैं

अन्ना तो एक है मशाल अनेक हैं

देश तो एक है देशवासी अनेक हैं

ह्रदय की पुकार है

संत की सत्कार है

जाग उठा है आज सारा हिन्दूस्तान

बस अब तो सच्चाई की इंतिज़ार है !!!!

अमरदीप गौरव

इंसान हूँ मैं इंसान हूँ

July 9th, 2011 § 4 Comments

पथिक हूँ प्यासा हूँ

पथिक हूँ जिंदगी का

प्यासा हूँ खुशी का

उम्मीद है मंजिल का

कहानी हूँ कविता हूँ

कहानी हूँ किताबों का

कविता हूँ जिंदगी के आयामों का

उम्मीद है पढ़े जाने का

पंक्षी हूँ कंक्षी हूँ

पंक्षी हूँ नीले गगन का

कंक्षी हूँ हरे चमन का

उम्मीद है डटे रहने का

नाव हूँ पतवार हूँ

नाव हूँ उलटी धार का

पतवार हूँ उस नाव का

उम्मीद है पार लगजाने का

कलम हूँ कलाकार हूँ

कलम हूँ उजागर करने का

कलाकार हूँ नया संशार गढ़ने का

उम्मीद है नया संशार बनने का

पथिक हूँ प्यासा हूँ

कहानी हूँ कविता हूँ

पंक्षी हूँ कंक्षी हूँ

नाव हूँ पतवार हूँ

कलम हूँ कलाकार हूँ

हर छन में मैं

अलग अलग अवतार हूँ

इंसान हूँ मैं इंसान हूँ

अपनी कल्पनाओं से अनजान हूँ |

अमरदीप गौरव

उनसे हुई मुलाकातों को याद करतें हैं

April 16th, 2011 § 2 Comments

जिंदगी के रास्तें में एक चौराहे पर आकर

कभी हम उन्हें तो कभी हम

उनसे हुई मुलाकातों को याद करतें हैं

कभी समंदर के किनारे तो कभी

पगडंडियों पर हम यूं ही ठमक जातें हैं

शीतल मलय पवन में आती उनकी आवाजों में

हम यूं ही बहे चले जातें हैं यूं ही खोये चले जातें हैं

पता नहीं आगे रास्ते में उनसे हमारी मुलाकात कब होगी

जब भी होगी वादा रहा फिर अपनी आँखों को रोने न देंगे….

अमरदीप गौरव

मेरी जिंदगी के सूनेपन में आपका यूं आना मुझे अच्छा लगा

April 12th, 2011 § 3 Comments

मेरी जिंदगी के सूनेपन में आपका यूं आना मुझे अच्छा लगा
समय की खामोशियों में आपका यूं कुछ गुनगुनाना मुझे अच्छा लगा
आपकी गुनगुनाहट में यूं मेरा खो जाना मुझे अच्छा लगा
मेरी मुस्कराहट पे आपका यूं शर्माना मुझे अच्छा लगा
हमारी दोस्ती पे यूं आपका इतराना मुझे अच्छा लगा
इस संसार में आपका यूं मिलना मुझे अच्छा लगा
मेरी कामयाबी के पीछे आपका यूं रहना मुझे अच्छा लगा
मेरी गलतियों पर आपका यूं समझाना मुझे अच्छा लगा
फूलों की तरह आपका मेरे गुलिस्तां में यूं महकना मुझे अच्छा लगा
प्यार भरी निगाहों से आपका यूं निहारना मुझे अच्छा लगा
मेरी हर ख्वाहिसो पर आपका यूं धयान रखना मुझे अच्छा लगा
नाविक की तरह आपका मेरी जिंदगी को यूं पार लगाना मुझे अच्छा लगा
आपका मेरी जिंदगी में यूं अहम हिस्सा बन जाना मुझे अच्छा लगा |

अमरदीप गौरव

मगर पता नहीं वो मुझे क्यों बदर किए बैठे हैं…

April 7th, 2011 § 2 Comments

मेरी हर सोच में मेरी हर सास में
किसी की बातों में किसी से मुलाकातों में
किसी भी किताब के हर पन्नों में
हर किसी की आँखों में
तो अपनी हाथों की हर लकीरों में
पानी में फेके हुए पत्थर से उठी हर तरंगों में
सूर्य की आती हुई हर किरणों में
पंछिओं की चहचाहट में
रातों की खामोशिओं में
घड़ी की टिक टिक कर गुजरते हर पलों में
पानी की गिरती हर एक बूंदों में
अपने लिखे हर शब्दों में
हर गीतों में हर कहानियों में
चित्रकारों की नूमाईशों में
हवाओं में फिजाओं में लहरों में तूफानों में
अपनी हर कविता की कल्पनाओं में
मैं !! उन्हें तलाशने की कोसिस करता हूँ…
वो मेरी जिंदगी में कुछ इस कदर सामिल हैं!!
मगर पता नहीं वो मुझे क्यों बदर किए बैठे हैं…

अमरदीप गौरव

ठान अपने शतक के शतक का इरादा तू !!

March 30th, 2011 § 3 Comments

दिखा दे अपनी आन तू
बना  ले अपनी सान तू
सजा ले अपनी कृपाण तू
कर ले तिरंगे को सलाम तू !!

खेल जा अपनी अरमान तू
लगा दे अपनी जान तू
दे पटखनी वार तू
साथ है हिंदुस्तान ये जान तू !!

बुलंद कर इरादा तू
कर अपनी कद जादा तू
कर अपनी शतक का वादा तू
ठान अपने शतक के शतक का इरादा तू !!

अमरदीप  गौरव

Dedicated to “God of Cricket” SR Tendulkar best of luck Indian Cricket Team ….

दूर जाना था तो पास क्यों आये …

March 19th, 2011 § 1 Comment

दूर जाना था तो पास क्यों आये
जख्म देना था तो साथ क्यों निभाए
कहानी बनाना  था तो सचाई क्यों बताये
दिल दुखाना तो प्यार क्यों जताए…

एक बार मुस्कुरा कर अपनी इच्छा बता देते
हम जिंदगी के हर छन क़दमों में लुटा देते
दोस्ती की किताब में हर पन्ना आपके नाम छपवा देते
दोस्ती के अलफ़ाज़ सुनहरे अक्षरों में गढ़वा देते…

दिया प्यार का सारे संसार में जला देते
पहेली जिंदगी की सरे आम सुलझा देते
एक बार मुस्कुरा कर अपनी इच्छा बता देते
दोस्ती के मायने हम तहे दिल से निभा देते ….

अमरदीप गौरव

ना जाने कब तक रूठी रहेगी खुशी मेरी …

March 18th, 2011 § Leave a Comment

ना जाने कब तक रूठी रहेगी खुशी मेरी …
ना जाने कब तक झूठी रहेगी हँसी मेरी
ना जाने कब तक बैठी रहेगी जिंदगी मेरी
ना जाने कब तक सुनाती रहेगी कहानी नयी !!

हर छन एक उमीद सी उठती है दिल में..
कभी तो खुशी आएगी मन-प्रांगन में
ललक है इस दिल की किसी की मुहब्बत मिलेगी कभी !!
हसीन सा वो मंजर न जाने कभी आएगा भी की नहीं

अपना तो गुलिस्तां इस जहान में नहीं…
क्या पता उस जहान से बुलावा आएगा की नहीं
परीयों की दुनिया में कहानियां हैं भरी
पर क्या पता उस कहानी में कभी आऊंगा भी की नहीं !!

अमरदीप गौरव

चुप रहकर हम सारे गम सहते चले गए…

February 26th, 2011 § Leave a Comment

चुप रहकर हम सारे गम सहते चले गए
और एहसास कागज पर उतरते चले गए …
गम सहने के हौसले हमारे बढते चले गए
अश्कों को अरमानो की मोती समझ कर संजोते चले गए…
ख्वाहिश अपनी अश्कों के समंदर में डुबोते चले गए…
और उन ग़मों के सहारे हम बुलंदियों को छुते चले गए…
जिंदगी के हर सपनों को बनाते चले गए सजाते चले गए…
और एहसास कागज पर उतरते चले गए …

अमरदीप गौरव

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