तुम्हारी धड़कन सुना मैने..!


तुम्हारी धड़कन सुना मैने..!
धक धक धक धक धक धक.!!
तुम्हारी हलचल देखा मैने..!
इधर से उधर … उधर से इधर.!!

कहानी लिखी जा रही है..!
पात्र गढ़े जा रहें हैं.!!
शब्द संजोये जा रहें हैं..!
रंगमंच सजाए जा रहें हैं.!!

तुम्हारे आने का इंतिज़ार…
मैं बेसब्री से कर रहा हूँ..!
तुम्हारी किल्कारियों में खोने…
मैं अभी से खुमार बैठा हूँ.!!

अमरदीप गौरव

भुलाना तो बहुत चाहा तुम्हे मगर यादें तो यादें है


भुलाना तो बहुत चाहा तुम्हे मगर यादें तो यादें है
कभी हम हार जातें हैं तो कभी ये जीत जाती हैं
और बस कुछ यूं ही यादें ही यादें रह जाती हैं
कभी तुम्हारी तो कभी तुम्हारी बातों की यादों में
यूं ही कभी हम हार जातें हैं तो कभी ये जीत जाती है
कभी तन्हाई में हम या हम्मे तन्हाई रह जाती है

अमरदीप गौरव

कैसे बताऊँ की तुम किस कदर जिहन में उतरे हुए हो


कैसे बताऊँ की तुम किस कदर जिहन में उतरे हुए हो
कैसे बताऊँ की आज भी तुम्हारी मुस्कराहट मुझे सुनाई देती है
कैसे बताऊँ की तुम किस कदर मेरे ख्वाबों में छाये हुए हो
कैसे बताऊँ की मेरी आँखे बंद होते ही तुम्हारी आँखे मुझे दिखाई देती हैं
कैसे बताऊँ की तुम्हारी साथ बितायी अरसों पहले की हर शाम मुझे
कैसे बताऊँ की वो शाम मुझे आखिरी शाम सा एहसास कराती हैं
कैसे बताऊँ की तुम्हारे जाने के बाद हर एक सुबह बेमानी सी लगती है
कैसे बताऊँ की इस दिल की धड़कन से तुम्हारी ही नाम निकलती है
कैसे बताऊँ की चाँद अलफ़ाज़ सजाने में तुम हज़ारो बार नजर आती हो
कैसे बताऊँ की अब तो अलफ़ाजें भी तुम्हारे बगैर बेमानी सी समझ आती हैं !!

अमरदीप गौरव

ये कहानी है दो पलों की !


जिंदगी दो पन्नों की
खुशी की एक दूसरी ग़मों की
क्या आखिरी क्या पहली
बस अपनी और अपनों की
ये कहानी है दो पलों की

मिलने की खुशी से जादा बिछड़ने का गम
तड़प भी ऐसी की दिन की रौशनी भी कम
नमी आखों में सूखे हैं होठ
कहीं पे हैं ढलाव तो कहीं पे हैं ओट

अपनों का प्यार अपनों के लिए तकरार
प्यारा सा संसार  और आपका इंतज़ार

जिंदगी दो पन्नों की
खुशी की एक दूसरी ग़मों की
क्या आखिरी क्या पहली
बस अपनी और अपनों की
ये कहानी है दो पलों की !

अमरदीप गौरव

बस अब तो सच्चाई की इंतिज़ार है !!!!


कह गए वो न जाने क्या

रह गए हम न जाने कहाँ

थम गए वक्त न जाने क्यों

हिल गयी धरती न जाने कैसे

पथ तो एक है पथिक अनेक हैं

पंथ तो एक है पंथी अनेक हैं

अन्ना तो एक है मशाल अनेक हैं

देश तो एक है देशवासी अनेक हैं

ह्रदय की पुकार है

संत की सत्कार है

जाग उठा है आज सारा हिन्दूस्तान

बस अब तो सच्चाई की इंतिज़ार है !!!!

अमरदीप गौरव

इंसान हूँ मैं इंसान हूँ


पथिक हूँ प्यासा हूँ

पथिक हूँ जिंदगी का

प्यासा हूँ खुशी का

उम्मीद है मंजिल का

कहानी हूँ कविता हूँ

कहानी हूँ किताबों का

कविता हूँ जिंदगी के आयामों का

उम्मीद है पढ़े जाने का

पंक्षी हूँ कंक्षी हूँ

पंक्षी हूँ नीले गगन का

कंक्षी हूँ हरे चमन का

उम्मीद है डटे रहने का

नाव हूँ पतवार हूँ

नाव हूँ उलटी धार का

पतवार हूँ उस नाव का

उम्मीद है पार लगजाने का

कलम हूँ कलाकार हूँ

कलम हूँ उजागर करने का

कलाकार हूँ नया संशार गढ़ने का

उम्मीद है नया संशार बनने का

पथिक हूँ प्यासा हूँ

कहानी हूँ कविता हूँ

पंक्षी हूँ कंक्षी हूँ

नाव हूँ पतवार हूँ

कलम हूँ कलाकार हूँ

हर छन में मैं

अलग अलग अवतार हूँ

इंसान हूँ मैं इंसान हूँ

अपनी कल्पनाओं से अनजान हूँ |

अमरदीप गौरव

उनसे हुई मुलाकातों को याद करतें हैं


जिंदगी के रास्तें में एक चौराहे पर आकर

कभी हम उन्हें तो कभी हम

उनसे हुई मुलाकातों को याद करतें हैं

कभी समंदर के किनारे तो कभी

पगडंडियों पर हम यूं ही ठमक जातें हैं

शीतल मलय पवन में आती उनकी आवाजों में

हम यूं ही बहे चले जातें हैं यूं ही खोये चले जातें हैं

पता नहीं आगे रास्ते में उनसे हमारी मुलाकात कब होगी

जब भी होगी वादा रहा फिर अपनी आँखों को रोने न देंगे….

अमरदीप गौरव